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फंड वसूली में पारदर्शिता की कमी और गैर-कानूनी प्रबंधन
सोसायटी प्रबंधन और फंड वसूली पर मुख्य सवाल:
अवैध वसूली:
सोसायटी अभी भी बिल्डर के अधीन है और कानूनी रूप से हैंडओवर नहीं हुई है। इसके बावजूद, कुछ लोग अनौपचारिक कमेटी बनाकर जबरन 'फेस्टिवल फंड' वसूल रहे हैं और पैसे न देने वालों को 'सपोर्ट न करने' की धमकी दे रहे हैं, जो पूरी तरह गलत है।
पक्के बिलों का अभाव:
खर्चे के विवरण में कैटरिंग, डेकोरेशन या साउंड सिस्टम के ओरिजिनल बिल/इनवॉइस नहीं दिखाए जाते। बिना पक्के रसीदों के यह पता लगाना असंभव है कि पैसा सही जगह खर्च हुआ है या नहीं।
पारदर्शिता की कमी :
जैसा कि लिफ्ट में चस्पा की गई खर्च की लिस्ट में देखा जा सकता है, किसी भी सामान की मात्रा नहीं लिखी गई है। सिर्फ कुल रकम लिख देना वित्तीय हेराफेरी का संकेत देता है।
गुणवत्ता और मात्रा पर संदेह :
बाजार में हर तरह की मिठाई और सामान उपलब्ध होता है। बिना बिल या दुकान के नाम के यह पता लगाना असंभव है कि जो सामान लाया गया वह अच्छी क्वालिटी का था या नहीं। रसीद न होने के कारण हम कभी नहीं जान सकते कि मिठाई किस दुकान से आई और उसकी सही मात्रा क्या थी। यह सीधा-सीधा पारदर्शिता का उल्लंघन है।
कमीशनखोरी का संदेह: ऑडिट और पक्के बिल न होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि यह सामुदायिक सेवा नहीं बल्कि एक 'जबरन वसूली का बिजनेस' बन गया है, जहाँ संभवतः जान-पहचान वालों को काम देकर कमीशन लिया जा रहा है।
अंत में, हम सबको यह समझने की जरूरत है कि कोई भी देवी-देवता अपने नाम पर जबरन वसूला गया पैसा कभी स्वीकार नहीं करते। भगवान तो स्वयं सबको देने वाला है, उसे हमारे ऐसे पैसों की जरूरत नहीं है जो दूसरों को डरा-धमकाकर लिए गए हों। दूसरों के हक के पैसे या जबरन ली गई रकम से किए गए 'हवन' या 'पूजा' का फल कभी नहीं मिलता। ईश्वर हमेशा सत्य का साथ देते हैं, न कि उन लोगों का जो धर्म की आड़ में तानाशाही, कमीशनखोरी या साजिश करते हैं। याद रखें, भक्ति में शुद्धता और इच्छा होनी चाहिए, डर और मजबूरी नहीं।
जय श्री राम🙏
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